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भारतीय सेना को 2028 के मध्य तक मिल सकता है अपना संचार उपग्रह, सीमावर्ती इलाकों में मजबूत होगी संपर्क व्यवस्था


नई दिल्ली, 19 अक्टूबर 2026: भारतीय सेना की संचार क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण रक्षा परियोजना पर काम जारी है। सेना को अपना पहला समर्पित संचार उपग्रह GSAT-7B मिलने की उम्मीद है। 19 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) इस उपग्रह को 2028 के मध्य के आसपास प्रक्षेपित करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। इससे सेना को दूरदराज के सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षित संचार और सैन्य अभियानों के दौरान बेहतर संपर्क व्यवस्था उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। 

क्या है GSAT-7B परियोजना?

GSAT-7B भारतीय सेना की संचार जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा एक उन्नत भूस्थिर संचार उपग्रह है। इसकी मदद से सेना की विभिन्न इकाइयों, सैन्य मुख्यालयों और महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों के बीच संचार व्यवस्था को बेहतर बनाने का लक्ष्य है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह लगभग पांच टन वजनी उपग्रह होगा। इसकी क्षमता का उपयोग उन क्षेत्रों में भी किया जा सकेगा, जहां सामान्य संचार नेटवर्क उपलब्ध नहीं हैं या भौगोलिक परिस्थितियों के कारण संपर्क स्थापित करना मुश्किल होता है। 

लॉन्च में क्यों हुई देरी?

इस उपग्रह को पहले नवंबर 2027 में प्रक्षेपित करने की योजना थी। हालांकि, तकनीकी कारणों से इसके प्रक्षेपण कार्यक्रम में लगभग छह महीने की देरी हुई है। अब इसके 2028 के मध्य तक लॉन्च होने की उम्मीद जताई गई है।

मार्च 2023 में रक्षा मंत्रालय ने इस परियोजना के लिए न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के साथ लगभग 3,000 करोड़ रुपये का अनुबंध किया था। NSIL, ISRO की वाणिज्यिक इकाई है। परियोजना का उद्देश्य सेना की लंबे समय से चली आ रही समर्पित उपग्रह संचार की जरूरत को पूरा करना है। 

सेना को क्या होंगे प्रमुख फायदे?

  • सुरक्षित संचार: सैन्य इकाइयों के बीच सूचना के आदान-प्रदान को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने में मदद मिलेगी।

  • सीमावर्ती क्षेत्रों में संपर्क: पहाड़ी इलाकों और दूरस्थ सीमावर्ती क्षेत्रों में संचार सुविधाओं को बेहतर बनाया जा सकेगा।

  • बेहतर कमांड और नियंत्रण: सैन्य अधिकारियों को विभिन्न इकाइयों के साथ समन्वय और अभियानों के प्रबंधन में सहायता मिल सकती है।

  • महत्वपूर्ण रक्षा प्रणालियों को समर्थन: उपग्रह का उपयोग सैनिकों के साथ-साथ हथियार प्रणालियों, हवाई प्लेटफॉर्म और अन्य आवश्यक सैन्य संसाधनों के संचार में किया जा सकेगा।

  • वैकल्पिक संचार व्यवस्था: यदि जमीन पर मौजूद संचार नेटवर्क बाधित हो जाएं, तो उपग्रह आधारित संपर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

तीनों सेनाओं की अंतरिक्ष क्षमता को मजबूत करने की तैयारी

भारतीय वायुसेना और नौसेना के पास पहले से समर्पित संचार उपग्रह हैं। सेना अब तक अपनी संचार जरूरतों के लिए मुख्य रूप से वायुसेना के GSAT-7A उपग्रह पर निर्भर रही है। GSAT-7B इस निर्भरता को कम करने और सेना की विशेष जरूरतों के अनुरूप संचार व्यवस्था तैयार करने की दिशा में अहम कदम होगा।

इसके अलावा, रक्षा मंत्रालय ने वायुसेना के लिए GSAT-7C नामक एक अन्य समर्पित संचार उपग्रह परियोजना के लिए भी अनुबंध किया है। इससे स्पष्ट है कि भारत अपनी सैन्य क्षमताओं में अंतरिक्ष आधारित तकनीक की भूमिका बढ़ाने पर ध्यान दे रहा है। 

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?

आधुनिक युद्ध में सुरक्षित और निर्बाध संचार बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। दुर्गम इलाकों में तैनात सैनिकों तक सूचना पहुंचाना, विभिन्न सैन्य इकाइयों के बीच तालमेल बनाए रखना और संकट की स्थिति में संपर्क कायम रखना किसी भी सैन्य अभियान की सफलता को प्रभावित कर सकता है।

उपग्रह आधारित संचार से इन जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसकी वास्तविक प्रभावशीलता उपग्रह की तकनीकी क्षमताओं, ग्राउंड नेटवर्क और अन्य रक्षा प्रणालियों के साथ उसके एकीकरण पर निर्भर करेगी।

निष्कर्ष: GSAT-7B परियोजना भारतीय सेना की संचार व्यवस्था को अधिक स्वतंत्र, सुरक्षित और सक्षम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इसका प्रक्षेपण 2028 के मध्य तक हो जाता है, तो यह दूरदराज के क्षेत्रों में सैन्य संपर्क और कमांड व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दे सकता है।

कॉपीराइट नोट: यह समाचार स्वतंत्र शब्दों और मौलिक वाक्य संरचना में लिखा गया है। परियोजना की लागत, तकनीकी विवरण और संभावित प्रक्षेपण समय प्रकाशित रिपोर्टों पर आधारित हैं; लॉन्च की तारीख में बदलाव संभव है।