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अग्निकुल कॉसमॉस को ₹200 करोड़ की R&D सहायता, पुन: उपयोग योग्य अग्निबाण विकसित करने की तैयारी


नई दिल्ली/चेन्नई: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण कदम सामने आया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत काम करने वाले Technology Development Board (TDB) ने चेन्नई स्थित स्पेस-टेक कंपनी अग्निकुल कॉसमॉस के साथ ₹200 करोड़ की वित्तीय सहायता का समझौता किया है। यह राशि Research Development and Innovation (RDI) Fund के माध्यम से दी जाएगी और इसका मुख्य उद्देश्य अग्निकुल के Agnibaan Reusable Launch Vehicle (RLV) को विकसित करना है।

अग्निबाण को बनाया जाएगा पुन: उपयोग योग्य

इस परियोजना का फोकस केवल एक रॉकेट विकसित करने तक सीमित नहीं है। योजना ऐसी लॉन्च प्रणाली तैयार करने की है, जिसे भविष्य में बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। इसके लिए रॉकेट के प्रोपल्शन, उड़ान, कक्षा में स्थापित करने, नीचे लाने और सुरक्षित रिकवरी जैसी तकनीकों पर काम किया जाएगा।

सरकारी जानकारी के मुताबिक परियोजना तकनीक को मौजूदा Technology Readiness Level (TRL)-4 और उससे आगे के चरण से TRL-8 तक ले जाने का लक्ष्य रखती है। इसका मतलब प्रयोगात्मक स्तर की तकनीक को अधिक परिपक्व और वास्तविक परिचालन उपयोग के करीब पहुंचाना है।

₹200 करोड़ की सहायता किस तरह मिलेगी?

TDB के अनुसार वित्तीय सहायता Optionally Convertible Debentures (OCD) के माध्यम से प्रदान की जाएगी। यह RDI Fund के तहत दी जा रही सहायता है और इसका उद्देश्य ऐसी स्वदेशी तकनीक को आगे बढ़ाना है, जिसके विकास के लिए लंबे समय तक अनुसंधान और पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है।

TDB पहले भी अग्निकुल के छोटे उपग्रहों के लिए मॉड्यूलर और कॉन्फिगरेबल लॉन्च व्हीकल के विकास तथा व्यावसायीकरण में सहयोग कर चुका है। नई सहायता उसी तकनीकी यात्रा को अगले चरण तक ले जाने के लिए है।

रीयूजेबल रॉकेट क्यों महत्वपूर्ण है?

पारंपरिक लॉन्च सिस्टम में रॉकेट के कई हिस्से एक मिशन के बाद दोबारा इस्तेमाल नहीं किए जा सकते। यदि किसी लॉन्च वाहन के महत्वपूर्ण हिस्सों को सुरक्षित तरीके से वापस लाकर फिर उड़ाया जा सके, तो लंबे समय में लॉन्च की लागत और निर्माण संबंधी जरूरतों को कम करने की संभावना बनती है।

अग्निबाण RLV कार्यक्रम इसी दिशा में काम करने का प्रयास है। प्रस्तावित डिजाइन में रीयूजेबल अपर स्टेज, डिसेंट प्रोपल्शन और नियंत्रित वापसी एवं रिकवरी से जुड़ी तकनीकों को विकसित करने की योजना है।

इंजन में भी होगी उन्नत तकनीक

परियोजना के महत्वपूर्ण हिस्सों में ऐसे प्रोपल्शन सिस्टम का विकास शामिल है, जिन्हें आवश्यकता के अनुसार दोबारा चालू किया जा सके और जिनके थ्रस्ट को अलग-अलग चरणों में नियंत्रित किया जा सके।

Restart और deep-throttling जैसी क्षमताएं किसी पुन: उपयोग योग्य लॉन्च वाहन के उतरने और लैंडिंग चरण में विशेष रूप से उपयोगी होती हैं। इसलिए इन तकनीकों का सफल विकास अग्निबाण RLV कार्यक्रम की महत्वपूर्ण तकनीकी जरूरतों में शामिल है।

अंतरिक्ष तक बार-बार पहुंच बनाने का लक्ष्य

इस कार्यक्रम का व्यापक उद्देश्य ऐसी लॉन्च प्रणाली तैयार करना है, जो भविष्य में अधिक नियमित और दोहराए जा सकने वाले मिशनों को संभव बनाए। सरकारी विवरण के अनुसार प्रस्तावित आर्किटेक्चर का लक्ष्य लॉन्च और निर्माण लागत को कम करने के साथ-साथ अंतरिक्ष मलबे को घटाने की दिशा में भी योगदान देना है।

यदि पुन: उपयोग की तकनीक सफलतापूर्वक विकसित और प्रमाणित होती है, तो भविष्य में छोटे उपग्रहों तथा अन्य अंतरिक्ष मिशनों के लिए अधिक लचीली लॉन्च क्षमता तैयार हो सकती है।

अग्निकुल की पहले की तकनीकी उपलब्धियां

अग्निकुल कॉसमॉस पहले से ही स्वदेशी रॉकेट तकनीक के क्षेत्र में काम कर रही है। कंपनी ने Agnibaan लॉन्च व्हीकल के विकास के साथ-साथ Agnilet नामक सिंगल-पीस, 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन पर भी काम किया है।

नई RDI परियोजना में इन तकनीकी क्षमताओं को एक ऐसे व्यापक सिस्टम में विकसित करने पर जोर है, जिसमें लॉन्च के साथ-साथ वाहन की वापसी और पुन: उपयोग की व्यवस्था भी शामिल हो।

भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए संकेत

भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने के बाद स्टार्टअप कंपनियां लॉन्च व्हीकल, उपग्रह और अंतरिक्ष से जुड़ी दूसरी तकनीकों पर काम कर रही हैं। TDB की यह वित्तीय सहायता बताती है कि स्वदेशी और उन्नत अंतरिक्ष तकनीकों के विकास में सरकारी R&D समर्थन की भूमिका भी बढ़ रही है।

इस परियोजना के जरिए निजी क्षेत्र की तकनीकी क्षमता और सरकारी वित्तीय सहयोग को एक साथ लाने का प्रयास किया जा रहा है।

आगे की चुनौती क्या होगी?

₹200 करोड़ की सहायता परियोजना के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय समर्थन है, लेकिन पुन: उपयोग योग्य लॉन्च वाहन विकसित करना तकनीकी रूप से जटिल प्रक्रिया है। प्रोपल्शन, गाइडेंस, उड़ान नियंत्रण, कक्षा में सटीक प्रवेश, नियंत्रित अवतरण और रिकवरी—इन सभी प्रणालियों को एक साथ विश्वसनीय तरीके से काम करना होगा।

इसलिए वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अग्निकुल इन तकनीकों को परीक्षण और सत्यापन के विभिन्न चरणों से कितनी प्रभावी ढंग से आगे ले जाती है।

निष्कर्ष

अग्निकुल कॉसमॉस के साथ ₹200 करोड़ के RDI समझौते को भारत में पुन: उपयोग योग्य लॉन्च तकनीक विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण वित्तीय और तकनीकी समर्थन के रूप में देखा जा सकता है। परियोजना का लक्ष्य अग्निबाण RLV को ऐसी प्रणाली के रूप में विकसित करना है, जिसमें लॉन्च के साथ वाहन की नियंत्रित वापसी और भविष्य में पुन: उपयोग की क्षमता हो।

अगर यह तकनीकी कार्यक्रम अपने लक्ष्यों तक पहुंचता है, तो भारत की स्वदेशी लॉन्च क्षमता में एक नया विकल्प जुड़ सकता है और बार-बार अंतरिक्ष मिशन संचालित करने की दिशा में निजी क्षेत्र की भूमिका और मजबूत हो सकती है।