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देश के बिजली संयंत्रों में कोयले की कमी से बढ़ी चिंता, 191 में से 96 प्लांट के पास तीन दिन से भी कम का स्टॉक


नई दिल्ली, 21 अक्टूबर 2026। देश में बिजली की बढ़ती मांग के बीच कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में ईंधन के भंडार को लेकर चिंता बढ़ गई है। रॉयटर्स की 21 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 191 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में से 96 संयंत्रों के पास कोयले का भंडार गंभीर रूप से कम स्तर पर पहुंच गया है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के अनुसार, 19 अक्टूबर तक इन संयंत्रों के पास तीन दिन से भी कम समय तक बिजली उत्पादन करने लायक कोयला बचा था। 

यह स्थिति ऐसे समय सामने आई है, जब असामान्य रूप से गर्म मौसम के कारण बिजली की खपत बढ़ रही है। इसके साथ ही कमजोर मानसून से जलविद्युत उत्पादन में कमी आई है, जिससे बिजली की मांग पूरी करने के लिए कोयला आधारित संयंत्रों पर दबाव बढ़ गया है।

एक महीने में बढ़े कम भंडार वाले संयंत्र

रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर के मध्य में गंभीर रूप से कम कोयला भंडार वाले संयंत्रों की संख्या 60 थी, जो 19 अक्टूबर तक बढ़कर 96 हो गई। इसका मतलब है कि निगरानी में शामिल लगभग आधे बिजली संयंत्रों में ईंधन की उपलब्धता निर्धारित महत्वपूर्ण स्तर से नीचे पहुंच गई है।

यहां गंभीर रूप से कम भंडार का अर्थ यह है कि संबंधित संयंत्र के पास सामान्य परिस्थितियों में तीन दिन से कम समय तक बिजली बनाने के लिए पर्याप्त कोयला उपलब्ध है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी प्रभावित संयंत्रों में बिजली उत्पादन बंद हो गया है।

गर्मी और बढ़ती खपत ने बढ़ाया दबाव

भारत में इस साल बिजली की अधिकतम दैनिक मांग पिछले साल की तुलना में लगभग 45 से 50 गीगावाट ज्यादा रही है। असामान्य गर्मी के कारण एयर कंडीशनर, कूलर और अन्य शीतलन उपकरणों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी बिजली की खपत को प्रभावित कर रही है। रिपोर्ट में गर्म मौसम का संबंध अल नीनो से भी जोड़ा गया है।

बिजली की मांग में इस वृद्धि के बीच उत्पादन व्यवस्था के सामने चुनौती यह है कि पर्याप्त ईंधन उपलब्ध रखते हुए लगातार आपूर्ति कैसे सुनिश्चित की जाए। यदि कोयले की आपूर्ति और खपत के बीच संतुलन नहीं बनता है, तो कम भंडार वाले संयंत्रों पर दबाव बना रह सकता है।

जलविद्युत उत्पादन घटने से बढ़ी कोयले पर निर्भरता

कोयला भंडार पर दबाव बढ़ने का एक अन्य कारण जलविद्युत उत्पादन में गिरावट है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले कोयला आधारित बिजली उत्पादन में 13.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि जलविद्युत उत्पादन में 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। 

जब जलविद्युत संयंत्रों से कम बिजली मिलती है, तो मांग पूरी करने के लिए ताप विद्युत संयंत्रों को अधिक उत्पादन करना पड़ सकता है। इससे कोयले की दैनिक खपत बढ़ती है और पर्याप्त आपूर्ति नहीं होने पर भंडार तेजी से घटने लगता है।

बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ा अंतर

रिपोर्ट में बताया गया है कि सितंबर में भारत में बिजली की मांग और उपलब्ध आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़कर 560 मिलियन किलोवाट-घंटे हो गया। यह अगस्त 2023 के बाद दर्ज किया गया सबसे बड़ा अंतर बताया गया है।

यह आंकड़ा बिजली व्यवस्था पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है। हालांकि, मांग और आपूर्ति के बीच अंतर का अर्थ अपने आप में यह नहीं है कि देशभर में बिजली कटौती अनिवार्य हो जाएगी। वास्तविक स्थिति अलग-अलग राज्यों, बिजली वितरण कंपनियों और उपलब्ध उत्पादन क्षमता के अनुसार बदल सकती है।

सरकार ने आपूर्ति बढ़ाने के कदम उठाए

कोयले के भंडार में कमी के बावजूद कोयला मंत्रालय ने इससे पहले बिजली संयंत्रों तक आपूर्ति बढ़ाने की जानकारी दी थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर के शुरुआती दिनों में बिजली क्षेत्र के लिए कोयले की रेल ढुलाई भी सितंबर के औसत की तुलना में बढ़ी थी। इसके बावजूद 19 अक्टूबर तक गंभीर रूप से कम भंडार वाले संयंत्रों की संख्या बढ़कर 96 पहुंच गई। 

आपूर्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कोयले की उपलब्धता, रेल परिवहन और जरूरतमंद संयंत्रों तक ईंधन पहुंचाने के बीच समन्वय महत्वपूर्ण रहेगा। साथ ही, बिजली की मांग में उतार-चढ़ाव को देखते हुए उत्पादन और ईंधन भंडार की लगातार निगरानी आवश्यक है।

आम लोगों और उद्योगों पर क्या हो सकता है असर?

यदि कोयले की आपूर्ति लंबे समय तक मांग के अनुरूप नहीं रहती है, तो बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर बिजली की उपलब्धता, औद्योगिक गतिविधियों और बिजली वितरण व्यवस्था पर पड़ने की आशंका रहती है।

हालांकि, फिलहाल उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर देशभर में व्यापक बिजली कटौती होने का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले दिनों में कोयले की आपूर्ति कितनी रहती है, बिजली की मांग किस स्तर पर बनी रहती है और अन्य ऊर्जा स्रोत कितना योगदान देते हैं।

आगे की स्थिति पर रहेगी नजर

देश के लगभग आधे कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में गंभीर रूप से कम भंडार की स्थिति ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। बढ़ती खपत, कम जलविद्युत उत्पादन और कोयले की दैनिक जरूरत के बीच संतुलन बनाए रखना आने वाले दिनों में प्रमुख चुनौती रहेगा।

फिलहाल सबसे अहम तथ्य यह है कि 19 अक्टूबर तक 191 में से 96 बिजली संयंत्रों के पास तीन दिन से भी कम समय का कोयला भंडार था। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि कोयले की आपूर्ति में बढ़ोतरी से स्थिति कितनी सुधरती है और बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरकार तथा ऊर्जा कंपनियां क्या कदम उठाती हैं।