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टीवी को ‘डस्टबिन’ कहने वाले बयान पर बहस तेज, शक्ति अरोड़ा ने रखा अलग नजरिया


मुंबई: भारतीय मनोरंजन जगत में इन दिनों टीवी की मौजूदा स्थिति और बदलते कंटेंट को लेकर बहस छिड़ी हुई है। अभिनेता रोहित रॉय की टेलीविजन को लेकर की गई विवादित टिप्पणी के बाद अब अभिनेता शक्ति अरोड़ा ने इस चर्चा में संतुलित राय रखी है। उनका कहना है कि मनोरंजन के हर माध्यम की अपनी उपयोगिता, शैली और अलग दर्शक वर्ग होता है।

रोहित रॉय की टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद

रोहित रॉय ने हाल ही में एक बातचीत के दौरान भारतीय टेलीविजन के मौजूदा कंटेंट पर सवाल उठाते हुए इसे बेहद तीखे शब्दों में परिभाषित किया था। उनका मुख्य मुद्दा टीवी पर बनने वाले कंटेंट की गुणवत्ता और उसमें रचनात्मकता की कमी को लेकर था।

बयान सामने आने के बाद टीवी इंडस्ट्री से जुड़े कई कलाकारों ने इस पर असहमति जताई। कुछ कलाकारों ने सवाल उठाया कि जिस माध्यम ने लंबे समय तक कलाकारों को पहचान और रोजगार दिया, उसे इस तरह कमतर आंकना उचित है या नहीं।

बाद में रोहित रॉय ने दी सफाई

विवाद बढ़ने के बाद रोहित रॉय ने अपने बयान का संदर्भ स्पष्ट करने की कोशिश भी की। उनका कहना था कि उनकी टिप्पणी किसी अभिनेता, निर्देशक या निर्माता को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने के लिए नहीं थी। वे मुख्य रूप से टेलीविजन पर तैयार किए जा रहे कंटेंट की गुणवत्ता को लेकर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे थे।

उन्होंने यह भी कहा कि वह खुद लगभग तीन दशक से टीवी से जुड़े रहे हैं और टेलीविजन के हितों को लेकर उनकी अपनी चिंताएं हैं। उनके मुताबिक, उनका उद्देश्य माध्यम से जुड़े लोगों का अपमान करना नहीं था, बल्कि कंटेंट में सुधार की जरूरत पर बात करना था।

शक्ति अरोड़ा ने रखा संतुलित नजरिया

इसी विवाद के बीच शक्ति अरोड़ा ने बहस को किसी एक माध्यम को बेहतर या खराब बताने के बजाय व्यापक नजरिए से देखने की बात कही। उनका मानना है कि टीवी, बॉलीवुड, OTT और वर्टिकल कंटेंट—सभी की अपनी अलग जगह है।

शक्ति के अनुसार, टेलीविजन की अपनी पहुंच और दर्शकों से जुड़ाव है। वहीं OTT ने कहानी कहने के तरीके में काफी बदलाव किया है और नई तरह की कहानियों के लिए जगह बनाई है। दूसरी ओर, मोबाइल-केंद्रित वर्टिकल वीडियो भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।

बदलते दौर में दर्शकों की पसंद भी बदली

मनोरंजन की दुनिया अब सिर्फ सिनेमाघरों और पारंपरिक टीवी स्क्रीन तक सीमित नहीं रह गई है। दर्शक अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर कंटेंट देख रहे हैं।

टीवी अब भी बड़े पैमाने पर पारिवारिक और लंबे फॉर्मेट वाले कार्यक्रमों का प्रमुख माध्यम है। फिल्मों का अपना बड़ा सिनेमाई अनुभव है, जबकि OTT प्लेटफॉर्म अपेक्षाकृत अलग कहानी, शैली और एपिसोडिक फॉर्मेट के लिए जाने जाते हैं। इसी बीच छोटे और वर्टिकल वीडियो ने मोबाइल यूजर्स के बीच अपनी मजबूत जगह बनाई है।

एक ही कलाकार, कई प्लेटफॉर्म

आज के दौर में कलाकारों के लिए भी प्लेटफॉर्म की सीमाएं पहले जैसी नहीं रही हैं। कई अभिनेता टीवी से शुरुआत करने के बाद फिल्मों, वेब सीरीज और डिजिटल प्रोजेक्ट्स तक पहुंचे हैं।

यही बदलाव मनोरंजन उद्योग की बदलती प्रकृति को दिखाता है। अब किसी कलाकार की पहचान केवल इस आधार पर तय नहीं होती कि उसने टीवी, फिल्म या OTT में काम किया है। काम की गुणवत्ता, दर्शकों की प्रतिक्रिया और कलाकार की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।

असली बहस कंटेंट की गुणवत्ता पर होनी चाहिए

शक्ति अरोड़ा की राय से यह बहस एक दूसरे महत्वपूर्ण सवाल की तरफ भी जाती है—क्या किसी पूरे माध्यम को अच्छा या खराब कहने के बजाय उसके कंटेंट की गुणवत्ता पर चर्चा होनी चाहिए?

हर प्लेटफॉर्म पर बेहतर और कमजोर दोनों तरह की सामग्री मौजूद हो सकती है। ऐसे में किसी एक माध्यम को पूरी तरह खारिज करने के बजाय दर्शकों की बदलती पसंद, तकनीकी बदलाव और कहानी कहने के नए तरीकों को समझना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

निष्कर्ष

रोहित रॉय की टिप्पणी ने टीवी कंटेंट की गुणवत्ता को लेकर चर्चा जरूर तेज कर दी है, लेकिन शक्ति अरोड़ा का नजरिया इस बहस को एक व्यापक दिशा देता है। टीवी की अपनी ताकत है, फिल्मों की अपनी पहचान है, OTT ने कहानी कहने के नए रास्ते खोले हैं और वर्टिकल कंटेंट तेजी से उभर रहा है। ऐसे में आने वाले समय में मनोरंजन की दुनिया में माध्यम से ज्यादा महत्वपूर्ण कंटेंट और दर्शकों से उसका जुड़ाव हो सकता है।