न्यूयॉर्क। मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। तेल और गैस की ऊंची कीमतों, समुद्री परिवहन में जोखिम, बढ़ती बीमा लागत और भू-राजनीतिक अनिश्चितता का असर दुनिया के अलग-अलग बाजारों पर दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में लचीलापन देख रही हैं, लेकिन ऊर्जा संकट लंबा खिंचने पर महंगाई और विकास पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है। मध्य-पूर्व का संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था तक मुख्य रूप से ऊर्जा बाजार के माध्यम से पहुंच रहा है। तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने पर दुनिया के आयातक देशों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बिजली उत्पादन, परिवहन, उद्योग और कृषि लागत पर भी पड़ता है। IMF ने सितंबर में कहा था कि 2026 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि करीब 3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, लेकिन ऊर्जा कीमतों, महंगाई और बढ़ते कर्ज से जुड़े जोखिम ऊंचे बने हुए हैं। ऊर्जा आपूर्ति के संदर्भ में Strait of Hormuz विशेष रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है। यह मार्ग खाड़ी क्षेत्र से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक तेल और गैस पहुंचाने के लिए प्रमुख समुद्री रास्तों में शामिल है। 26 सितंबर को ईरान की ओर से इस मार्ग को दोबारा खोलने और क्षेत्रीय संघर्ष समाप्त करने के लिए सात दिन के प्रस्ताव की खबर सामने आई। प्रस्ताव पर अमेरिका की स्थिति को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। इस घटनाक्रम पर वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजर इसलिए है क्योंकि होर्मुज से जुड़ी अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रहने पर तेल की कीमतों, शिपिंग और बीमा लागत पर असर पड़ सकता है। युद्ध और आपूर्ति संबंधी चिंताओं के कारण कच्चे तेल की कीमतों में हाल के महीनों में काफी अस्थिरता रही है। 17 सितंबर को Brent crude 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ था। 26 सितंबर को शुक्रवार के कारोबार में Brent करीब 2.1 प्रतिशत गिरकर 104.32 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि WTI करीब 2.3 प्रतिशत गिरकर 92.41 डॉलर रहा। इससे संकेत मिलता है कि बाजार एक तरफ संभावित युद्धविराम और आपूर्ति सुधार की उम्मीदों पर प्रतिक्रिया दे रहा है, जबकि दूसरी तरफ मध्य-पूर्व से जुड़ी नई घटनाओं को लेकर जोखिम बना हुआ है। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था के लगभग हर हिस्से तक पहुंच सकता है। परिवहन महंगा होने पर माल ढुलाई की लागत बढ़ती है। उद्योगों के लिए ईंधन और बिजली महंगी हो सकती है। इसके बाद कंपनियां बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा उत्पादों की कीमतों में शामिल कर सकती हैं। इस प्रक्रिया से महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। IMF ने भी चेतावनी दी है कि ऊर्जा झटका महंगाई कम करने की प्रक्रिया को मुश्किल बना सकता है। ऊर्जा संकट का एक कम दिखाई देने वाला प्रभाव कृषि क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। प्राकृतिक गैस और ऊर्जा की कीमतें बढ़ने पर उर्वरक उत्पादन तथा परिवहन की लागत बढ़ सकती है। IMF के अनुसार मध्य-पूर्व के संघर्ष के कारण ऊर्जा के साथ-साथ उर्वरक और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ा है। यदि आपूर्ति व्यवधान लंबे समय तक जारी रहता है, तो कम आय वाले देशों में खाद्य सुरक्षा का जोखिम अधिक गंभीर हो सकता है। युद्ध क्षेत्र के आसपास से गुजरने वाले जहाजों के लिए सुरक्षा जोखिम बढ़ने से समुद्री परिवहन महंगा हो सकता है। जहाजों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने, अतिरिक्त सुरक्षा लेने या ज्यादा बीमा प्रीमियम देने की जरूरत पड़ सकती है। कुछ तेल उत्पादकों ने आपूर्ति जारी रखने के लिए Gulf of Oman क्षेत्र में ship-to-ship transfers जैसे वैकल्पिक तरीकों का इस्तेमाल बढ़ाया है। Reuters के अनुसार सितंबर में इस तरह के हस्तांतरण का स्तर अगस्त की तुलना में काफी बढ़ा, लेकिन इससे परिवहन लागत भी ऊंची हुई है। एशियाई अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक ऊर्जा बाजार में महत्वपूर्ण आयातक हैं। इसलिए तेल और गैस की कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी से इस क्षेत्र के उद्योगों और उपभोक्ताओं पर दबाव पड़ सकता है। IMF ने पहले ही कहा है कि ऊर्जा आयात पर अधिक निर्भर एशियाई उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस झटके से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हो सकती हैं। ऊंची ऊर्जा लागत के साथ कमजोर मुद्रा और वित्तीय दबाव होने पर आयात बिल और महंगा हो सकता है। कम आय वाले देशों के पास महंगी ऊर्जा और खाद्य वस्तुओं के झटके से निपटने के लिए अक्सर सीमित वित्तीय संसाधन होते हैं। अगर सरकारें ईंधन या खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सब्सिडी बढ़ाती हैं, तो उनके बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। दूसरी तरफ यदि कीमतों का पूरा असर उपभोक्ताओं तक पहुंचता है, तो घरेलू खर्च और जीवन-यापन की लागत बढ़ सकती है। IMF ने विशेष रूप से सीमित नीति-क्षमता वाले ऊर्जा आयातक देशों को अधिक जोखिम में बताया है। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं यह नहीं कह रही हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था व्यापक मंदी की ओर निश्चित रूप से बढ़ रही है। IMF का सितंबर आकलन 2026 में लगभग 3 प्रतिशत वैश्विक वृद्धि का अनुमान बनाए रखता है। लेकिन यह वृद्धि कई जोखिमों के बीच हो रही है। लंबे समय तक महंगी ऊर्जा, ऊंची महंगाई, बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और कमजोर निवेश आर्थिक गतिविधियों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं। अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए केवल आर्थिक आंकड़े ही महत्वपूर्ण नहीं हैं। मध्य-पूर्व में संघर्ष की दिशा, होर्मुज से समुद्री आवाजाही और संभावित युद्धविराम जैसे कूटनीतिक घटनाक्रम भी तेल और वित्तीय बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं। यदि ऊर्जा आपूर्ति सामान्य होने की दिशा में ठोस प्रगति होती है, तो बाजार में दबाव कम हो सकता है। इसके विपरीत, नए हमले या समुद्री मार्गों में और व्यवधान कीमतों और परिवहन लागत पर फिर से दबाव डाल सकते हैं। मध्य-पूर्व संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने ऊर्जा, महंगाई, व्यापार और वित्तीय स्थिरता से जुड़ी कई चुनौतियां एक साथ ला दी हैं। अभी तक वैश्विक अर्थव्यवस्था ने ऊर्जा झटके को अपेक्षा से बेहतर तरीके से संभाला है, लेकिन IMF के आकलन के अनुसार जोखिम ऊंचे बने हुए हैं। आने वाले समय में तेल और गैस की आपूर्ति, होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की स्थिति और संघर्ष को लेकर कूटनीतिक प्रयास वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक बने रहेंगे।ऊर्जा आपूर्ति बनी सबसे बड़ी चिंता
होर्मुज संकट का वैश्विक असर
तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव
महंगा तेल बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव
खाद और खाद्य कीमतों पर असर
शिपिंग और बीमा लागत बढ़ी
एशिया पर विशेष दबाव
विकासशील देशों के लिए चुनौती
वैश्विक विकास पर क्या असर?
बाजारों की नजर कूटनीति पर
निष्कर्ष
युद्ध और ऊर्जा संकट से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव, महंगे ईंधन और व्यापारिक अनिश्चितता बढ़ी






