BREAKING NEWS

logo

Advertisement
Advertisement

आरक्षित लोकसभा और विधानसभा सीटों के रोटेशन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा रुख, याचिका पर राहत देने से इनकार


नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा और विधानसभा के आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को समय-समय पर बदलने यानी रोटेशन प्रणाली लागू करने की मांग से जुड़ी याचिका पर राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार संसद के क्षेत्र में आता है। इसके साथ ही आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था और उनके निर्धारण को लेकर एक बार फिर राजनीतिक एवं संवैधानिक बहस तेज होने की संभावना है।

आरक्षित सीटों के रोटेशन की मांग क्या है?

देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की कुछ सीटें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। इन निर्वाचन क्षेत्रों में संबंधित वर्गों के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं, हालांकि मतदान क्षेत्र के सभी पात्र मतदाता मतदान करते हैं।

रोटेशन की मांग का मुख्य उद्देश्य यह है कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को समय-समय पर बदला जाए। इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे अलग-अलग क्षेत्रों को आरक्षण का लाभ मिल सकता है और लंबे समय तक एक ही निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित रहने की स्थिति से बचा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से क्यों किया इनकार?

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से आरक्षित लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में बदलाव की व्यवस्था लागू करने की मांग की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर राहत देने से इनकार करते हुए निर्णय लेने की जिम्मेदारी संसद पर छोड़ दी।

अदालत के रुख से यह संकेत मिलता है कि निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण और उनके रोटेशन से संबंधित नीतिगत एवं विधायी बदलावों के लिए संसदीय प्रक्रिया महत्वपूर्ण है।

संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है विषय

निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन, आरक्षण और संबंधित संवैधानिक प्रावधान देश की चुनावी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन विषयों में बदलाव के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक होता है।

संसद कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से निर्वाचन क्षेत्रों की संरचना तथा आरक्षण संबंधी व्यवस्थाओं पर निर्णय लेने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसलिए आरक्षित सीटों के रोटेशन को लागू करने का प्रश्न केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि व्यापक विधायी और संवैधानिक विचार-विमर्श से जुड़ा हुआ है।

आरक्षण व्यवस्था पर फिर तेज हो सकती है बहस

आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को बदलने के मुद्दे पर अलग-अलग विचार सामने आते रहे हैं। रोटेशन के समर्थकों का मानना है कि इससे आरक्षण का लाभ विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।

दूसरी ओर, निर्वाचन क्षेत्र के लगातार बदलने से स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व, विकास योजनाओं की निरंतरता और चुनावी रणनीतियों पर प्रभाव पड़ने की आशंका भी जताई जाती है।

इसलिए इस व्यवस्था में किसी भी बदलाव से पहले उसके सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक प्रभावों का आकलन जरूरी माना जाता है।

चुनावी व्यवस्था पर क्या पड़ सकता है असर?

यदि भविष्य में संसद इस विषय पर कोई नया कानून या व्यवस्था लागू करती है, तो उसका प्रभाव लोकसभा और विधानसभा चुनावों के निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण पर पड़ सकता है।

हालांकि, फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद मौजूदा कानूनी व्यवस्था में स्वतः कोई बदलाव नहीं हुआ है। आरक्षित सीटों की वर्तमान स्थिति में परिवर्तन के लिए संबंधित विधायी और संवैधानिक प्रक्रिया आवश्यक होगी।

निष्कर्ष: आरक्षित लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का राहत देने से इनकार करना चुनावी व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने इस विषय पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी संसद पर छोड़ दी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में इस मुद्दे पर संसद में किस तरह की चर्चा होती है और आरक्षण व्यवस्था में बदलाव को लेकर कोई ठोस पहल की जाती है या नहीं।