नई दिल्ली: विदेश में रहने वाले भारतीय नागरिकों के वैवाहिक विवादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। शीर्ष अदालत के मुताबिक, किसी विदेशी अदालत द्वारा केवल इस आधार पर दिया गया तलाक का आदेश कि पति-पत्नी का विवाह अब पूरी तरह टूट चुका है, भारत में अपने आप मान्य नहीं माना जा सकता। अदालत के इस रुख से उन मामलों पर असर पड़ सकता है, जिनमें भारतीय नागरिक विदेश में तलाक की कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हैं और बाद में उस फैसले को भारत में लागू कराना चाहते हैं। भारतीय कानून के तहत विदेशी अदालत के फैसले की वैधता और मान्यता निर्धारित कानूनी प्रावधानों के आधार पर परखी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विदेश में मिला तलाक भारतीय कानूनी व्यवस्था में स्वतः प्रभावी नहीं हो जाता। इसके लिए यह देखना जरूरी है कि संबंधित विदेशी अदालत को मामले की सुनवाई का अधिकार था या नहीं और फैसला भारतीय कानून के मान्यता प्राप्त आधारों के अनुरूप है या नहीं। इस कानूनी स्थिति से अंतरराष्ट्रीय विवाह विवादों में शामिल भारतीय नागरिकों को महत्वपूर्ण संदेश मिला है। विदेश में तलाक लेने से पहले भारतीय कानून के तहत उसकी संभावित मान्यता और कानूनी परिणामों को समझना जरूरी होगा।
विदेशी अदालत के तलाक आदेश को भारत में स्वतः मान्यता नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कानूनी रुख






