पलामू की कला-साधना के अमर हस्ताक्षर ‘नय्यर साहब’ की स्मृति में चित्रकला प्रदर्शनी
मेदिनीनगर (पलामू): पलामू प्रमंडल की उर्वर माटी ने साहित्य, कला, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में देश को कई अनमोल रत्न दिए हैं। इन्हीं में से एक अमूल्य धरोहर थे दिवंगत चित्रकार ‘नय्यर साहब’, जिनकी अद्वितीय कला-साधना आज भी प्रशंसकों और हजारों शिष्यों के दिलों में जीवंत है।
गत वर्ष उनके इंतकाल के बाद उनकी स्मृतियों को अक्षुण्ण रखने और उनकी कलात्मक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के ध्येय से मासूम आर्ट ग्रुप द्वारा वरिष्ठ रंगकर्मी व पत्रकार-छायाकार सैकत चटर्जी के संयोजन में एक भव्य चित्रकला प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। इसी कड़ी में प्रदर्शनी से जुड़े आधिकारिक पोस्टर का गरिमामय लोकार्पण नय्यर साहब के निवास स्थान पर उनकी धर्मपत्नी, भाई एवं सुपुत्र की उपस्थिति में संपन्न हुआ।
रंगों के जादूगर थे नय्यर साहब
नय्यर साहब केवल कैनवास पर लकीरें खींचने वाले कलाकार नहीं थे, बल्कि वे रंगों के सच्चे जादूगर थे। उनके बनाए चित्रों में जीवन की धड़कन, मानवीय भावनाएं और प्रकृति की गहरी संवेदनाएं जीवंत हो उठती थीं। पलामू की सांस्कृतिक यात्रा में उनका योगदान अविस्मरणीय है। अपने जीवनकाल में उन्होंने लगभग 30 हजार विद्यार्थियों को चित्रकला की बारीकियों से रूबरू कराया, जो आज देश-दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी कला-विरासत की मशाल जला रहे हैं।
प्रतिमा स्थापना व पुस्तकों के प्रकाशन की मांग
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित वक्ताओं ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नय्यर साहब जैसे महान साधक के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि:
उनकी स्मृति में पलामू में एक भव्य प्रतिमा स्थापित की जाए।
उनकी अधूरी एवं अप्रकाशित पांडुलिपियों व पुस्तकों को अविलंब प्रकाशित कराया जाए।
"किसी महान कलाकार के जाने के बाद ही उसकी वास्तविक विरासत का मूल्यांकन होता है। आने वाली पीढ़ियां उनके जीवन, संघर्ष और सृजन पर शोध करेंगी। नय्यर साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व को सहेजकर रखना पलामू की सांस्कृतिक धरोहर को बचाने जैसा है।"
कला-प्रेमियों और आम जनमानस से उपस्थिति की अपील
मासूम आर्ट ग्रुप एवं आयोजकों ने पलामू के समस्त चित्रकारों, रंगकर्मियों, साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों, युवाओं, छात्र-छात्राओं, मजदूर-किसानों और कला-प्रेमियों से अपील की है कि वे इस चित्रकला प्रदर्शनी में अधिकाधिक संख्या में भाग लें और रंगों के इस महानायक की साधना को श्रद्धापूर्वक नमन करें।
भले ही नय्यर साहब की तूलिका थम गई हो, लेकिन उनके कैनवास की भाषा और रंगों का जादू आज भी मुखर है।


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