मुंबई/नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक की आने वाली मौद्रिक नीति को लेकर बाजार में ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म Nomura का आकलन बाजार में दिखाई दे रही अपेक्षाओं से काफी अलग है। Nomura का अनुमान है कि दिसंबर 2026 तक RBI कुल मिलाकर करीब 50 बेसिस प्वाइंट तक रेपो रेट बढ़ा सकता है, जबकि बाजार अगले एक साल में लगभग 125 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी को कीमतों में शामिल कर रहा है। Nomura के अनुसार RBI अक्टूबर और दिसंबर की बैठकों में 25-25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर सकता है। इस स्थिति में रेपो रेट मौजूदा 5.25 प्रतिशत से बढ़कर करीब 5.75 प्रतिशत हो सकता है। ब्रोकरेज के मुताबिक यह कदम लंबी अवधि के आक्रामक दर-वृद्धि चक्र की शुरुआत के बजाय महंगाई की उम्मीदों को नियंत्रित रखने के लिए किया गया नीतिगत समायोजन हो सकता है। दूसरी तरफ, वित्तीय बाजार में अगले 12 महीनों में करीब 125 बेसिस प्वाइंट की दर बढ़ोतरी का अनुमान कीमतों में दिखाई दे रहा है। Nomura का मानना है कि यह अनुमान मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों की तुलना में काफी आक्रामक है। उसके विश्लेषण में सीमित दर-वृद्धि वाले परिदृश्य की संभावना अधिक बताई गई है। RBI के सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में महंगाई शामिल है। अगस्त 2026 में भारत की खुदरा महंगाई 4.82 प्रतिशत रही, जो RBI के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर है। कच्चे तेल और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी ने भी आने वाले महीनों की महंगाई को लेकर चिंता बढ़ाई है। Nomura का आकलन है कि खाद्य और ऊर्जा कीमतों से निकट अवधि में महंगाई बढ़ सकती है, लेकिन अभी अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से में व्यापक और लगातार महंगाई दबाव के संकेत सीमित हैं। इसी आधार पर ब्रोकरेज का मानना है कि RBI को बहुत लंबे और बड़े दर-वृद्धि चक्र की आवश्यकता नहीं पड़ सकती। RBI की मौद्रिक नीति समिति यानी MPC की अगली बैठक 5 से 7 अक्टूबर 2026 के बीच प्रस्तावित है। इस बैठक में रेपो रेट और मौद्रिक नीति के रुख पर फैसला होगा। Reuters के हालिया अर्थशास्त्री सर्वे में भी अक्टूबर में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की उम्मीद जताई गई है, हालांकि मौद्रिक नीति का वास्तविक फैसला MPC ही करेगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची तेल कीमतें भारत के लिए विशेष महत्व रखती हैं क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। महंगा तेल आयात लागत और महंगाई पर दबाव डाल सकता है। इसके साथ ही रुपये की कमजोरी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भी RBI के नीति निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण बाहरी कारक हैं। यदि RBI रेपो रेट बढ़ाता है तो इसका असर बैंकों की फंडिंग लागत और समय के साथ कुछ कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। फ्लोटिंग-रेट वाले होम लोन या अन्य कर्ज लेने वाले ग्राहकों की EMI या ऋण अवधि प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, ऊंची ब्याज दरें महंगाई को नियंत्रित करने और अर्थव्यवस्था में मांग को संतुलित करने के मौद्रिक नीति उपकरण के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं। आने वाले समय में बाजार की निगाह खुदरा महंगाई, कच्चे तेल की कीमत, रुपये की विनिमय दर, अमेरिकी फेड की नीति और घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर रहेगी। इन्हीं संकेतकों के आधार पर RBI के आगे के फैसलों को लेकर बाजार की अपेक्षाओं में बदलाव हो सकता है। RBI की आगामी ब्याज दर नीति को लेकर इस समय बाजार और Nomura के अनुमान में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। जहां बाजार अगले एक साल में करीब 125 बेसिस प्वाइंट की संभावित बढ़ोतरी को कीमतों में शामिल कर रहा है, वहीं Nomura दिसंबर तक कुल 50 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि का अनुमान लगा रहा है। हालांकि, यह दोनों ही बाजार आकलन हैं—अंतिम फैसला RBI की MPC की वास्तविक आर्थिक आंकड़ों और परिस्थितियों के आधार पर होगा।Nomura का 25-25 बेसिस प्वाइंट का अनुमान
बाजार की उम्मीद इससे कहीं ज्यादा
महंगाई बनी हुई है अहम चुनौती
Nomura को व्यापक महंगाई का खतरा सीमित दिख रहा
RBI की अगली MPC बैठक अक्टूबर में
महंगा तेल और रुपये की चाल भी महत्वपूर्ण
ब्याज दर बढ़ने का आम लोगों पर असर
आगे किन संकेतकों पर नजर रहेगी?
निष्कर्ष



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