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RBI ने रेपो रेट बढ़ाकर 5.50% किया, करीब चार साल बाद ब्याज दर में बढ़ोतरी


नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI ने महंगाई के बढ़ते दबाव और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए बड़ा फैसला लिया है। मौद्रिक नीति समिति यानी MPC ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की है। इसके बाद रेपो रेट 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो गया है। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब RBI ने नीतिगत ब्याज दर बढ़ाई है।

मौद्रिक नीति का रुख भी बदला

सिर्फ रेपो रेट में वृद्धि ही नहीं हुई है, बल्कि RBI ने अपनी मौद्रिक नीति के रुख में भी बदलाव किया है। MPC ने पहले के 'न्यूट्रल' रुख की जगह 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' यानी परिस्थितियों के अनुसार धीरे-धीरे मौद्रिक सख्ती का रुख अपनाया है।

इस बदलाव को बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि केंद्रीय बैंक अब महंगाई के जोखिम को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों को लेकर अधिक सख्त रुख अपना सकता है। हालांकि, आगे का फैसला महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

महंगाई पर RBI की नजर

रेपो रेट बढ़ाने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारणों में महंगाई का बढ़ता जोखिम है। अगस्त में खुदरा महंगाई 4.82 प्रतिशत रही, जो RBI के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर है।

RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान भी पहले के 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया है। कोर महंगाई के अनुमान में भी बढ़ोतरी की गई है।

महंगा कच्चा तेल बना बड़ी चिंता

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने RBI की चिंता बढ़ाई है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है।

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल महंगा होने से देश के आयात बिल, परिवहन लागत और कई वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे महंगाई के जोखिम को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में सख्ती की जरूरत महसूस हुई है।

कमजोर मानसून और खाद्य महंगाई का असर

RBI के सामने सिर्फ ऊर्जा कीमतों की चुनौती नहीं है। कमजोर मानसून और कृषि उत्पादन से जुड़े जोखिम भी महंगाई के परिदृश्य को प्रभावित कर रहे हैं।

केंद्रीय बैंक ने संकेत दिया है कि खाद्य और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी अगर व्यापक महंगाई में बदलती है, तो आने वाले समय में मौद्रिक नीति को उसी के अनुसार समायोजित करना पड़ सकता है।

अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनी हुई है मजबूत

दिलचस्प बात यह है कि RBI ने ब्याज दर बढ़ाने के साथ आर्थिक विकास को लेकर अपना अनुमान भी सुधारा है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया गया है।

पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक GDP वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही। मजबूत निजी खपत और निवेश गतिविधियों ने आर्थिक गतिविधियों को सहारा दिया है।

आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?

रेपो रेट वह दर है जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। जब यह दर बढ़ती है तो बैंकों की फंडिंग लागत पर असर पड़ सकता है और इसका प्रभाव आगे चलकर कर्ज की ब्याज दरों पर दिखाई दे सकता है।

इसका असर खासतौर पर होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों तथा EMI पर पड़ सकता है। हालांकि, किसी व्यक्ति की EMI कितनी बढ़ेगी, यह उसके लोन के प्रकार, ब्याज दर, बकाया राशि और बैंक की दर-निर्धारण व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

FD और बचत करने वालों के लिए क्या संकेत?

ब्याज दरों में बढ़ोतरी का असर केवल कर्ज लेने वालों तक सीमित नहीं रहता। बैंक अपनी जमा और ऋण दरों में बदलाव कर सकते हैं। ऐसे में आगे चलकर कुछ सावधि जमा योजनाओं की ब्याज दरों में भी बदलाव संभव है।

हालांकि, RBI की घोषणा के तुरंत बाद हर बैंक की FD या लोन दर में समान बदलाव होना जरूरी नहीं है।

आगे ब्याज दरों का क्या होगा?

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के संकेत के मुताबिक, निकट अवधि में दरों में कटौती की संभावना कम दिखाई दे रही है। भविष्य में अगला कदम फिर से दर बढ़ाना या दर को स्थिर रखना हो सकता है, लेकिन इसका फैसला उस समय की महंगाई और आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा।

इसका मतलब यह है कि आज की 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी को तुरंत एक लंबे ब्याज दर चक्र की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी। केंद्रीय बैंक आगे के आंकड़ों पर नजर रखेगा।

RBI का संतुलन साधने का प्रयास

RBI के सामने इस समय दोहरी चुनौती है—एक तरफ महंगाई को नियंत्रण में रखना और दूसरी तरफ आर्थिक विकास की गति को बनाए रखना।

GDP वृद्धि मजबूत रहने के बावजूद बढ़ती ऊर्जा कीमतें, खाद्य महंगाई और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां जोखिम पैदा कर रही हैं। ऐसे में रेपो रेट में बढ़ोतरी को महंगाई के खिलाफ केंद्रीय बैंक की सावधानीपूर्ण रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

निष्कर्ष

RBI का रेपो रेट 5.50 प्रतिशत करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव है। करीब चार साल बाद हुई यह पहली बढ़ोतरी बताती है कि केंद्रीय बैंक अब बढ़ते महंगाई जोखिम को लेकर अधिक सतर्क है। साथ ही 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' का रुख यह संकेत देता है कि आने वाले महीनों में ब्याज दरों से जुड़े फैसले महंगाई और वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम पर बारीकी से निर्भर करेंगे।