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सऊदी अरब पर हूती मिसाइल और ड्रोन हमलों का खतरा बढ़ा, तेल आपूर्ति को लेकर भी चिंता


रियाद/तेहरान। मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरों के बाद सऊदी नेतृत्व वाला गठबंधन संभावित खतरों को रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई कर रहा है। ताजा घटनाक्रम ने क्षेत्रीय स्थिरता, नागरिकों की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

मिसाइल हमलों को रोकने में जुटा गठबंधन

27 अक्टूबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने दावा किया कि उसने सऊदी अरब के पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों की ओर दागी गई तीन बैलिस्टिक मिसाइलों और चार ड्रोन को रोककर नष्ट कर दिया। अधिकारियों ने संभावित खतरे को देखते हुए कुछ इलाकों में चेतावनी भी जारी की। बाद में पूर्वी क्षेत्र और खरज में तत्काल खतरा टलने की जानकारी दी गई।

इससे एक दिन पहले हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन के पंपिंग स्टेशनों और रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को निशाना बनाने का दावा किया था। हालांकि, इन विशेष हमलों की तत्काल स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई थी। दूसरी ओर, गठबंधन ने यमन की राजधानी सना में मिसाइल प्रक्षेपण स्थलों के खिलाफ कार्रवाई करने की जानकारी दी।

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि संघर्ष अब केवल यमन तक सीमित नहीं रह गया है। सऊदी अरब के हवाई अड्डों, तेल प्रतिष्ठानों और परिवहन ढांचे पर संभावित खतरे ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।

तेल आपूर्ति और वैश्विक बाजार पर असर की आशंका

सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में शामिल है। देश की तेल पाइपलाइन, रिफाइनरी और निर्यात केंद्र अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि इन सुविधाओं पर हमले होते हैं या सुरक्षा कारणों से उनका संचालन प्रभावित होता है, तो कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

विशेष रूप से सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके जरिए कच्चा तेल लाल सागर के तट तक पहुंचाया जा सकता है। ऐसे समय में जब होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री मार्गों को लेकर पहले से चिंता बनी हुई है, इस वैकल्पिक मार्ग की सुरक्षा भी अहम हो गई है।

तेल आपूर्ति में संभावित बाधा का असर भारत जैसे आयातक देशों पर भी पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने पर पेट्रोलियम उत्पादों की लागत, परिवहन खर्च और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। हालांकि, कीमतों में वास्तविक बदलाव संघर्ष की स्थिति, उपलब्ध आपूर्ति और बाजार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।