रांची, 29 अक्टूबर 2026। झारखंड हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि निचली अदालत में आरोपी से ऐसे अंग्रेजी भाषा में सवाल पूछे गए थे, जिसे वह समझने में सक्षम नहीं था। उसके बयान भी अंग्रेजी में दर्ज किए गए, जबकि रिकॉर्ड में इस बात का स्पष्ट उल्लेख नहीं था कि सवालों और जवाबों को उसकी समझ की भाषा में समझाया गया था। हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के लिए गंभीर समस्या माना और दोषसिद्धि तथा सजा का आदेश रद्द कर दिया। यह मामला चामरा उरांव से जुड़ा है, जिन्हें रांची की सत्र अदालत ने परमेश्वरी देवी की हत्या के मामले में दोषी ठहराया था। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 26 फरवरी 2009 को जमीन पर कब्जे को लेकर हुए विवाद के दौरान आरोपी ने कथित तौर पर महिला को कुएं में डुबोकर मार दिया था। इस मामले में निचली अदालत ने 25 अप्रैल 2018 को चामरा उरांव को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी करार दिया था। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाने के साथ 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। इसके बाद उन्होंने इस फैसले को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की। अपील की सुनवाई न्यायमूर्ति आनंद सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने निचली अदालत की कार्यवाही के उस हिस्से पर ध्यान दिया, जिसमें आरोपी से पूछताछ और उसका बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शामिल थी। हाईकोर्ट के सामने यह बात आई कि आरोपी अंग्रेजी भाषा नहीं समझता था, फिर भी उससे इसी भाषा में सवाल पूछे गए और उसके जवाब भी अंग्रेजी में दर्ज किए गए। दस्तावेज पर आरोपी के अंगूठे का निशान था, लेकिन रिकॉर्ड से यह सुनिश्चित नहीं होता था कि उसे बयान की पूरी सामग्री उसकी समझ की भाषा में पढ़कर सुनाई गई या समझाई गई थी। अदालत ने इस प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई। उसके अनुसार, यदि किसी आरोपी को सवालों का अर्थ ही स्पष्ट नहीं है, तो उसके जवाबों को उसके खिलाफ इस्तेमाल करना उसके बचाव के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। केवल औपचारिक रूप से बयान दर्ज कर लेना पर्याप्त नहीं है; यह भी जरूरी है कि आरोपी को उसके खिलाफ सामने आए तथ्यों को समझने और उन पर अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर मिले। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में भाषा की समझ बेहद महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति को उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों और साक्ष्यों से जुड़े सवाल उसी भाषा में समझाए जाने चाहिए, जिसे वह जानता हो। जरूरत पड़ने पर अनुवादक की सहायता भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि आरोपी अपनी बात ठीक ढंग से रख सके। आरोपी से पूछताछ की प्रक्रिया दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 से संबंधित थी। इस प्रावधान का उद्देश्य यह है कि अभियोजन के साक्ष्यों में सामने आई प्रतिकूल परिस्थितियों के बारे में आरोपी से सवाल किए जाएं और उसे उनका स्पष्टीकरण देने का अवसर मिले। यह प्रक्रिया महज औपचारिकता नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत ने माना कि जब आरोपी को उसकी समझ की भाषा में परिस्थितियां बताने का प्रमाण रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं हो, तो यह गंभीर प्रक्रियागत चूक है। इससे यह संदेह पैदा होता है कि आरोपी को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिला भी था या नहीं। संविधान के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए ऐसी कमियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के दोषसिद्धि संबंधी फैसले और आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया। इस तरह चामरा उरांव को हत्या के मामले में बरी कर दिया गया। इस फैसले से यह महत्वपूर्ण संदेश मिलता है कि आपराधिक मुकदमे में आरोपी को केवल अदालत के सामने उपस्थित कर देना पर्याप्त नहीं है। उसे कार्यवाही समझने, उसके खिलाफ पेश किए गए तथ्यों पर जवाब देने और प्रभावी बचाव का अवसर मिलना भी आवश्यक है। कानूनी महत्व: यह फैसला बताता है कि किसी आरोपी की समझ से बाहर की भाषा में पूछताछ करना और उसके बयान की सामग्री समझाए जाने का प्रमाण न होना निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। अदालत की प्रक्रिया में भाषा संबंधी बाधाओं को दूर करना न्याय सुनिश्चित करने की एक आवश्यक शर्त है।जमीन विवाद में महिला की हत्या का था आरोप
अंग्रेजी में दर्ज बयान पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल
निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर जोर
दोषसिद्धि और आजीवन कारावास का आदेश रद्द
झारखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला: अंग्रेजी में पूछताछ से निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित, हत्या के दोषी को किया बरी






