जमशेदपुर, 29 अक्टूबर 2026। झारखंड में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने सख्त रुख अपनाया है। जमशेदपुर में टाटा स्टील समेत 12 प्रमुख औद्योगिक, चिकित्सा और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को उनके डीजल जनरेटरों से निकलने वाले धुएं पर नियंत्रण के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। संबंधित संस्थानों को निर्धारित मानकों के अनुरूप प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाने और आवश्यक तकनीकी उपाय पूरे करने के लिए 180 दिन यानी छह महीने का समय दिया गया है। औद्योगिक गतिविधियों और शहरी क्षेत्रों में बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में डीजल जनरेटरों का इस्तेमाल किया जाता है। बिजली आपूर्ति बाधित होने पर ये मशीनें कारखानों, अस्पतालों और अन्य संस्थानों का संचालन जारी रखने में मदद करती हैं। हालांकि, इनसे निकलने वाला धुआं वातावरण की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। जनरेटरों के उत्सर्जन में सूक्ष्म कण और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी प्रदूषक गैसें मौजूद हो सकती हैं। इनका प्रभाव हवा की गुणवत्ता पर पड़ता है और लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहने से लोगों को सांस संबंधी परेशानियों का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस की समस्या से जूझ रहे लोगों पर इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है। इन्हीं चिंताओं को ध्यान में रखते हुए झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद ने संबंधित प्रतिष्ठानों को अपने जनरेटरों के उत्सर्जन को निर्धारित मानकों के अनुरूप रखने का निर्देश दिया है। जारी रिपोर्ट के अनुसार, नोटिस पाने वाले 12 प्रतिष्ठानों में औद्योगिक इकाइयों के साथ अस्पताल और व्यावसायिक संस्थान भी शामिल हैं। इनमें टाटा स्टील, टीआरएफ, टाटा पिगमेंट, एसटीपी लिमिटेड, शिवा प्लास्टिक, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और टेल्को के नाम बताए गए हैं। स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े संस्थानों में टाटा मेन अस्पताल, टाटा मोटर्स अस्पताल और टिनप्लेट अस्पताल शामिल हैं। इसके अलावा होटल साउथ पार्क और मिथिला मोटर्स को भी इस कार्रवाई के दायरे में रखा गया है। इन सभी प्रतिष्ठानों को अपने यहां स्थापित जनरेटरों की क्षमता और लागू पर्यावरणीय मानकों के अनुसार जरूरी कदम उठाने होंगे। इसका उद्देश्य केवल कागजी अनुपालन सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि जनरेटरों से निकलने वाले प्रदूषकों को तकनीकी रूप से कम करना है। प्रदूषण नियंत्रण पर्षद के निर्देश के मुताबिक, संबंधित संस्थानों को नोटिस मिलने की तारीख से 180 दिनों के भीतर जरूरी व्यवस्था करनी होगी। जनरेटर की क्षमता और लागू नियमों के अनुसार रेट्रोफिट उत्सर्जन नियंत्रण उपकरण लगाए जा सकते हैं। इसके अलावा, नियामक की ओर से स्वीकार्य अन्य तकनीकी विकल्पों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे उपकरण जनरेटर से निकलने वाले हानिकारक उत्सर्जन को कम करने में मदद करते हैं। हालांकि, उनका वास्तविक प्रभाव उपकरण की तकनीक, जनरेटर की क्षमता, रखरखाव और सही तरीके से स्थापना पर निर्भर करेगा। निर्धारित अवधि संस्थानों को तकनीकी व्यवस्था करने का अवसर देती है, लेकिन इसका अर्थ प्रदूषण संबंधी नियमों से छूट मिलना नहीं है। संबंधित प्रतिष्ठानों को लागू मानकों का पालन सुनिश्चित करना होगा। रिपोर्ट में बताया गया है कि निर्देशों का पालन नहीं करने वाले प्रतिष्ठानों पर पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जा सकता है। जनरेटर की क्षमता और उल्लंघन की प्रकृति के आधार पर इसकी दर 7,500 रुपये, 15,000 रुपये और 25,000 रुपये प्रतिदिन तक बताई गई है। इस प्रावधान का उद्देश्य संस्थानों को समय पर आवश्यक सुधार करने के लिए बाध्य करना और पर्यावरणीय नियमों के पालन को गंभीरता से लागू करना है। हालांकि, किसी विशेष प्रतिष्ठान पर वास्तविक देनदारी लागू नियमों, संबंधित आदेश और उल्लंघन के आकलन पर निर्भर करेगी। उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड मानवाधिकार सम्मेलन ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी के आधार पर इस मुद्दे को उठाया। संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष मनोज मिश्रा ने स्वच्छ हवा को नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बताया। उनका कहना है कि औद्योगिक विकास और रोजगार के अवसर जरूरी हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण तथा जनस्वास्थ्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। जमशेदपुर एक प्रमुख औद्योगिक शहर है, जहां कारखानों, परिवहन और अन्य गतिविधियों के साथ-साथ विभिन्न संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले जनरेटर भी उत्सर्जन के स्रोत हो सकते हैं। ऐसे में जनरेटरों से निकलने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय वायु गुणवत्ता सुधारने की व्यापक कोशिश का हिस्सा बन सकते हैं। यदि संबंधित प्रतिष्ठान निर्धारित समय में उपकरण लगाते हैं और उनका नियमित रखरखाव करते हैं, तो जनरेटरों से होने वाले हानिकारक उत्सर्जन में कमी लाने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही, निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन और नियमों के पालन की निगरानी भी महत्वपूर्ण होगी। निष्कर्ष: टाटा स्टील समेत 12 संस्थानों को दिया गया 180 दिनों का समय जमशेदपुर में जनरेटर उत्सर्जन पर नियंत्रण की दिशा में एक महत्वपूर्ण नियामकीय कदम है। अब इसका वास्तविक परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित संस्थान समयसीमा के भीतर कितनी प्रभावी कार्रवाई करते हैं और प्रदूषण नियंत्रण पर्षद अनुपालन की निगरानी किस तरह करता है।जनरेटरों से होने वाले प्रदूषण पर विभाग की नजर
टाटा स्टील समेत कई प्रमुख संस्थान सूची में
छह महीने के भीतर लगाने होंगे उपकरण
नियमों की अनदेखी पर पर्यावरणीय मुआवजे का प्रावधान
सूचना के अधिकार से सामने आया मामला
शहर की हवा पर क्या पड़ेगा असर?
झारखंड में प्रदूषण पर सख्ती: टाटा स्टील समेत 12 संस्थानों को 180 दिन की मोहलत, जनरेटरों पर लगाने होंगे उत्सर्जन नियंत्रण उपकरण






